Sunday, February 16, 2014

रिश्ते

क्या सोचूं मैं हर तरफ लोग
दो दो चेहरे लगाए घूम रहे हैं
हेर तरफ दोगलापन
रिश्ते नाते तो शायद इस गर्द में कहीं खो गए हैं
हम तो निरर्थक बालू को मुट्ठी
में भरने के प्रयास में लगे हैं
हेर तरफ भौतिग्वाद भारी है
रिश्तों के मायने तो अब इतिहास बन गए हैं
माँ भी अब ठंडी छाँव नहीं रही शायद
अब तो लोग रिश्तों को मुफ्त में भी लेने से डरते हैं
भाव चुकाने की बात तो बड़े बाद की है
सम्बन्ध अब नाम के रह गए हैं
खून की जगह अब पानी भी नहीं रहा
पता नहीं क्यूँ हम  ही मृगतृष्णा के पीछे भाग  रहे हैं
क्यूँ झूठी आस में जी रहे हैं

8 comments:

  1. sarthak or umda shabdon se sazi rachana.....

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  2. saeedhi aur sachhi baat jo dil ko chhu jaye .....bahut sundar

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  3. बहुत ही सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति।

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    1. धन्यवाद राजेन्द्र कुमार जी

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  4. सच में रिश्ते आज केवल मृग मरीचिका बन कर रह गए है...बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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    1. धन्यवाद कैलाश जी

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