Saturday, January 31, 2015

दुनियादारी

                अजब है यह दुनियादारी
                ताउम्र  निकल गई
               पर समझ नहीं आई
               सुनते थे  दुनियादारी
               के लिए करना
                पड़ता है सब
                 पर है क्या
                यह दुनियादारी
             ज़िन्दगी के इतने
            वसंत  गुज़र गए
            पर यह पहेली
           ना सुलझ पाई
           दुनियादारी है क्या
          क्यूँ निभानी पडती है
          जब पता ही नहीं यह
          है क्या , क्यूँ निभाते हैं हम

Sunday, December 28, 2014

नव वर्ष

                   कब आया
                  कब चला गया ,
             पता भी ना चला
                बोलने में कितना बड़ा
                कितना लम्बा
                साँस रुक जाये
                कुछ साकार
                कुछ प्रकार
              कितने फलीभूत
                कितने अधूरे
                 एहसास
              कुछ नई  उमंगें
              कुछ टूटे सपनें
             कुछ दुखती रगें
              कुछ खिलते पल
              खिलखिलाहटों
               संग कुछ आहें
               कुछ तिलिस्स्म
                टूटे
                कुछ में हम
                  खो गए
             कब २०१४  बीता
              समझ न सके
                 चलो नव वर्ष का
                   नई उमंगो नई
              इच्छाओं ,नये उत्साह
            से स्वागत करें

                     

                   

              

Tuesday, December 16, 2014

ईश्वर रहम कर , मौला रहम कर

अल्लाह रहम कर मौला रहम कर
इन धर्म  के ठेकेदारों का भी कुछ कर
 हम तो देख सुन कर ही नहीं संभल पा रहे
उन नन्ही कोंपलों का क्या  कसूर
जिनेह खिलने से पहले ही उखाड़ फैंका
दिल नहीं कांपा  ?
हाथ नहीं डोले ?
अपनी आँख के तारे नहीं सूझे ?
घर दूसरों का जलाने पे
खुद का आशियाना कैसे बचा पाओगे
जो इस खौफ से गुजरे हैं
उनेहं कैसे संभाल पाओगे
जिनके घर उजड़े हैं
जिनकी आशाएं टूटी हैं
उनकी हाये से कैसे बच पाओगे?
हैवानियत को भी शर्मिंदा कर गए
क्या कसूर था इनका ?
क्या आने वाली पीढ़ीयों  को बता पाओगे
जो यह आग लगा रहे हो
क्याय खुद बचा पाओगे ?
सोच के देखो इनकी जगह
खुद के चरागों को रख कर
मेरे ईश्वर रहम कर
हे भगवन रहम कर





Thursday, November 27, 2014

साथी चल नई राह बनाएँ

चल खुद के लिय जिया जाये
बहुत जी लिए दुनियां के लिय
अभी भी कुछ लम्हें हैं हम दोनों के पास
कहीं फिर रंज न रह जाये
बेवजह वक़्त को इलज़ाम न दिया जाए
 साथी चल अभी  भी कदम से कदम
                मिला लिया जाए
चल भुला के सब दूर कहीं खो जाएँ
जहाँ बस मैं और तू भुला हम हो जाएँ
गिले शिकवों से बहूत दूर चले जाएँ
मुश्किल हो शायद पर नामुमकिन नहीं
    चल नई राह बनाई जाए
चल खो जाएँ दूर उन पहाड़ों की खामोशिओं में
उस हवा से लहराते पत्तों के संगीत में
चल राही राह  बनाएं , चल साथी में तू भूल हम हो जाएँ

Tuesday, September 23, 2014

अधूरी कविता

य हवायें तो मेरी अपनी थी
यह दीवारें तो मेरे हर सुख दुःख की सांझी थी
 इस आँगन में  मेरे नए सपनों ने अंगड़ाई ली थी
कभी यहाँ नए युग की शुरुआत हुई थी |

कई बरसों की गवाह है यह हवाएं
खट्टे मीठे पल संजोय हैं यह हवाएं
कभी बसंत तो कभी पतझड़
सर्द  गर्म आहों की गवाह यह हवाएं |


झरोखों से झांकती रौशनी
दरो दीवार सब अपने तो थे
अब क्यूँ इनमें दरारें आ रही हैं
क्या संभल नहीं पाई |

यह जर्जर  होती इमारत मेरी ही तो थी
यहाँ की धूल भी तो मेरी अपनी थी
यह मकड़ों ने कब जालों से ढांप ली
कहाँ खो गई वो चमक ...............|

सब अपने ही तो थे यहाँ
अपना एक छोटा सा संसार बनाया था
मैंने भी चिरैया सा एक घोंसला
कब  पंखेरू उड़ गए जो मेरे अपने थे





Sunday, September 7, 2014

उफ़ान

नदी अपने पूरे उफान पे है
चारों ओर हाहाकार मची है
तबाही ही तबाही हर ओर
जलथल हुई धरा


नदी में उफान  क्यों
यह शांत कलकल
आज उफान क्यूँ
ज्यूँ हर बाधा तोड़
सब बहा ले जाना हो


यह तो सोचा होता
कितना बाँधा है किनारों को
सब इसमें  डाल दिया
जो जिसे मिला

इसके सहने की भी सीमा है
यह किसने सोचा
इसकी भी अपनी गति है
किसने समझा

इसके किनारों  को कितना बांधते
कितना सहा इसने
किसी ने नहीं सोचा
कितना खुद में समाये रही
कौन जाने

कुछ दिन के उफान  के बाद
 फिर उसी रस्ते चल देगी 
इसके किनारों पे दुनिया बसी रहे
यह वसुंधरा हरी रहे

सब भूल इन अपनों के लिए
फिर सब अपने अंदर
दफना  फिर शांत होगी
उसी पथ पे कलकल

Sunday, August 17, 2014

राखी

जा नी रखड़ीये जयून्दी रह

 हेर साल इंज ही भैणा नु

वीरां दी याद  दवांदी रह

 सुखणा मनौन्दी रह

 किसे वीर दा गुट सुन्ना न रखीं

 जा नी रखड़ीये जयून्दी रह

भैणा  नू गोडे गोडे चा रखीं

वीर भैना नु ना भूलन कदी

भैना ते वीरा दे प्यार नु

याद दवान द्वांदी रखडी